ला- ओपाला प्लांट बंद: मधुपुर से छिन गई 37 साल पुरानी औद्योगिक पहचान

Dec 5, 2025 - 08:20
Dec 5, 2025 - 09:16
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ला- ओपाला प्लांट बंद: मधुपुर से छिन गई 37 साल पुरानी औद्योगिक पहचान

ला-ओपाला ने बनाया था मधुपुर को पहचान

  • La Opala ने 1987 में अपनी कंपनी पंजीकृत की थी, और 1988 में भारत में पहली बार ओपल ग्लास (opal-ware) प्लेट/बर्तन निर्माण की फैक्टरी स्थापित की थी — वह फैक्टरी मध्य में स्थापित थी, “मधुपुर, झारखण्ड (तब बिहार)” में हुआ करता था।

  • 1996 में, उसी फैक्टरी में भारत की पहली क्रिस्टल-ग्लास (24% ली़ड क्रिस्टल) निर्माण यूनिट शुरू की गयी थी, ब्रांड नाम “Solitaire” था।

  • इससे मधुपुर न सिर्फ स्थानीय-विकास क्षेत्र बना, बल्कि भारतीय घरेलू वन-व्यंजन (tableware) उद्योग में अपनी महत्वपूर्ण जगह बना ली थी।

इस प्रकार,  ला-ओपला की फैक्टरी ने मधुपुर की अर्थव्यवस्था, रोज़गार और पहचान — तीनों में महत्वपूर्ण योगदान दिया।


बदलते समय और गिरावट: फैक्टरी का बंद होना

  • लेकिन 7 जुलाई 2024 को, La Opala RG Ltd ने मधुपुर में अपनी ओपल-ग्लास प्लांट (opal division plant) बंद करने की आधिकारिक घोषणा की। कारण “पुरानी, अप्रचलित, अर्द्ध-स्वचालित तकनीक, कम उत्पादन गुणवत्ता, बाजार में प्रतिस्पर्धा और बढ़ती लागत।” 

  • इसके तहत करीब 281 मजदूरों की रोज़ी-रोटी प्रभावित हुई। मजदूर यूनियन समेत कई लोगों का इसके खिलाफ आक्रोश देखने को मिला था।

  • कंपनी के बयान के अनुसार, पुराने तकनीकी आधार, कच्चे माल व इनपुट लागत में वृद्धि तथा बाजार में कम मांग — ये सभी कारण थे जिनसे यह कदम उठाना पड़ा।


मधुपुर के लिए असर: रोजगार और पहचान में क्षति

इस फैक्टरी के बंद होने से मधुपुर को कई तरह के असर देखने को मिला:

  • सैकड़ों मजदूर, जो पिछले कई सालों से फैक्टरी में काम कर रहे थे — अब बेरोजगार है।

  • स्थानीय कारोबार, सप्लाई-चैन, दुकानें, परिवहन — उन गतिविधियों पर असर जहाँ फैक्टरी से जुड़ा कारोबार था।

  • मधुपुर की पहचान — एक औद्योगिक नगरी, ग्लास और टेबलवेयर निर्माण केंद्र — धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगी।

इस घटना ने दिखा दिया कि कैसे बदलती अर्थव्यवस्था और बाज़ार स्थितियों में, पुरानी टेक्नोलॉजी वाले उद्योग — जो कभी “शहर की शान” हुआ करते थे — समय के साथ कितनी अस्थिर हो सकते हैं।


एक युग की समाप्ति और भविष्य की चुनौतियाँ

मधुपुर की La Opala फैक्टरी — जिसने 1980–90 के दशक में मधुपुर को पहचान दी, रोजगार दिया और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ाया — अब इतिहास बन गई है। लेकिन इससे एक सवाल भी खड़ा होता है: क्या मधुपुर अब अपने लिए नया औद्योगिक रास्ता खोज पाएगा?

अगर स्थानीय प्रशासन, निवेशक और लोग मिलकर — नई तकनीक, छोटे उद्योग, स्वरोज़गार या अन्य विकल्पों पर काम करें — तो फैक्टरी बंद होना अवसाद नहीं, बल्कि नए अवसरों की शुरुआत भी हो सकती है।