मार्बल हाउस कोठी मधुपुर: प्रशासन ने किस आधार पर दिया हाईकोर्ट आदेश का हवाला?
मधुपुर देवघर: "मार्बल हाउस" से जुड़ी लीज भूमि पर दखल कब्जा दिलाए जाने की कार्रवाई को लेकर जब सवाल उठे, तो प्रशासनिक स्तर पर हाई कोर्ट के आदेश का हवाला दिया गया। अधिकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई किसी व्यक्ति विशेष को लाभ पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि न्यायालयीय निर्देशों के अनुपालन में की गई है।
हालांकि, सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि—
- प्रशासन ने हाई कोर्ट के किस वाद संख्या (Case No.) और किस तिथि के आदेश के तहत यह दखल दिलाया?
- क्या वह आदेश यथास्थिति (Status Quo) से संबंधित था या किसी पक्ष को दखल/कब्जा देने का स्पष्ट निर्देश था?
- क्या हाई कोर्ट के आदेश में लीज शर्तों के उल्लंघन, अवैध निर्माण या SPT Act, 1949 के पहलुओं पर कोई स्पष्ट टिप्पणी की गई है?
स्थानीय जानकारों के अनुसार, सामान्यतः हाई कोर्ट के आदेशों में लीज उल्लंघन की स्थिति में प्रशासन को कानून के अनुसार कार्रवाई करने का निर्देश दिया जाता है, न कि बिना समुचित जांच किसी एक पक्ष को दखल सौंपने का।
क्या हाईकोर्ट आदेश SPT Act व BLR Act से ऊपर है?
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि—
- हाई कोर्ट का कोई भी आदेश SPT Act, 1949 और BLR Act, 1950 जैसे विशेष कानूनों को निष्प्रभावी नहीं करता।
- यदि भूमि SPT क्षेत्र या राज्य में निहित श्रेणी की है, तो प्रशासन पर यह अनिवार्य दायित्व बनता है कि वह पहले अधिनियमों के प्रावधानों का अनुपालन करे।
- हाई कोर्ट के आदेश की आड़ में लीज शर्तों के उल्लंघन को नजरअंदाज करना या अवैध निर्माण को वैध ठहराना कानूनन उचित नहीं माना जा सकता।
दखल दिलाने से पहले क्या अनिवार्य प्रक्रियाएं अपनाई गईं?
अब तक सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि—
✔️ स्थल की संयुक्त मापी कराई गई या नहीं
✔️ लीज शर्तों की जांच रिपोर्ट तैयार हुई या नहीं
✔️ SPT/BLR Act के तहत सक्षम पदाधिकारी की अनुमति ली गई या नहीं
✔️ सभी प्रभावित पक्षों को सुनवाई का अवसर दिया गया या नहीं
यदि ये प्रक्रियाएं पूरी किए बिना दखल दिलाया गया, तो यह स्वयं में प्रशासनिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
हाई कोर्ट आदेश का हवाला — पारदर्शिता जरूरी
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों की मांग है कि प्रशासन—
संबंधित हाई कोर्ट आदेश की प्रमाणित प्रति सार्वजनिक करे,
यह स्पष्ट करे कि आदेश कब्जा दिलाने से जुड़ा था या केवल स्थिति स्पष्ट करने/यथास्थिति बनाए रखने से,
और बताए कि आदेश के अनुपालन में SPT Act, 1949 एवं BLR Act, 1950 के किन प्रावधानों का पालन किया गया।
जनहित बनाम प्रशासनिक निर्णय
यह मामला अब केवल भूमि विवाद नहीं, बल्कि न्यायालय के आदेश की व्याख्या, प्रशासनिक विवेक और कानून के पालन से जुड़ा प्रश्न बन चुका है।
अब देखना यह है कि प्रशासन हाई कोर्ट आदेश की पूरी पारदर्शिता के साथ स्थिति स्पष्ट करता है या फिर यह मामला आगे न्यायिक समीक्षा का विषय बनता है।

