मधुपुर शहर में सात करोड़ से भी अधिक सरकारी जमीन पर भू-माफियाओं का कब्ज़ा, प्रशासन मौन

यह सच है कि देवघर, मोहनपुर और मधुपुर जैसे क्षेत्रों में लगभग 826 एकड़ जमीन को फर्जी दस्तावेज़ों के ज़रिए बेचा गया था, जिसमें सरकारी अधिकारियों की भी संलिप्तता थी। यह देवघर भूमि घोटाला 2000 से 2011 के बीच हुआ था और सीबीआई ने इस मामले की जांच की है।

Nov 6, 2025 - 23:32
Nov 7, 2025 - 09:24
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मधुपुर शहर में सात करोड़ से भी अधिक सरकारी जमीन पर भू-माफियाओं का कब्ज़ा, प्रशासन मौन
यह तस्वीर ली गई है

Madhupur News: मधुपुर शहर में सरकारी जमीनों पर भू-माफियाओं का कब्ज़ा तेजी से बढ़ता जा रहा है। शहर के कई इलाकों में सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित सरकारी भूमि पर अवैध निर्माण और प्लॉटिंग का कार्य खुलेआम जारी है, जो लगभग सात करोड़ से भी अधिक कीमत एक अधिकारी द्वारा आ की गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह सब प्रशासनिक मिलीभगत या लापरवाही के कारण संभव हो पा रहा है। मधुपुर में सील कोठी जो सरकारी ज़मीन है कुछ लोगों ने अपनी निजी संपत्ति की तरह बेचने और कब्ज़ा करने का खेल शुरू कर दिया है। 

एक स्थानीय निवासी ने बताया, “यह जमीन सरकारी  है, लेकिन कुछ रसूखदार लोगों के द्वारा अवैध कब्ज़ा किया जा रहा है। प्रशासन को सब जानकारी है, फिर भी कोई कार्रवाई नहीं हो रही।”

समाजसेवियों का कहना है कि यदि शीघ्र ही इन कब्ज़ों पर रोक नहीं लगाई गई तो मधुपुर शहर में सरकारी जमीनों का नामोनिशान मिट जाएगा। उन्होंने मांग की है कि जिला प्रशासन तत्काल भू-माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई करे और कब्ज़ा मुक्त अभियान चलाए।

प्रशासनिक प्रतिक्रिया:
इस संबंध में नगर प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि अवैध कब्ज़े की जांच की जा रही है और दोषियों पर जल्द कार्रवाई की जाएगी। हालांकि, अब तक जमीन खाली कराने की कोई ठोस पहल नहीं हुई है।

देवघर जिला में फ़र्ज़ी ज़मीन कब्ज़ा का रहा है पुराना इतिहास 

यह सच है कि देवघर, मोहनपुर और मधुपुर जैसे क्षेत्रों में लगभग 826 एकड़ जमीन को फर्जी दस्तावेज़ों के ज़रिए बेचा गया था, जिसमें सरकारी अधिकारियों की भी संलिप्तता थी। यह देवघर भूमि घोटाला 2000 से 2011 के बीच हुआ था और सीबीआई ने इस मामले की जांच की है।

घोटाले का विवरण: भूमि माफियाओं ने सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से दस्तावेजों में हेरफेर कर लगभग 824 से 826 एकड़ सरकारी और निजी जमीन बेच दी।

समय सीमा: यह घोटाला वर्ष 2000 से 2011 के बीच हुआ था।

मूल्य: उस समय इस जमीन का अनुमानित मूल्य ₹1,000 करोड़ से अधिक था, जो अब ₹2,000 करोड़ से अधिक हो चुका है।

जांच: सीबीआई ने इस भूमि घोटाले की जांच की है।

अवैध बिक्री: यह भी पाया गया कि संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम का उल्लंघन कर अवैध बिक्री लंबे समय से चल रही थी। 

सितंबर 2011 में पूर्व डीसी मस्तराम मीणा ने पकड़ा था जमीन घोटाला

देवघर में झारखंड के सबसे बड़े भूमि घोटाले का खुलासा सितंबर 2011 में पूर्व डीसी मस्तराम मीणा ने किया था. विभिन्न स्रोतों से मिली शिकायत के आधार पर श्री मीणा ने जमीन घोटाले की शिकायतों की जांच के लिए कमेटी बनायी. कमेटी को जांच में बड़ा मामला मिला. तकरीबन एक हजार करोड़ के भूमि घोटाले का भंडाफोड़ हुआ. इस घोटाले में सरकारी कर्मियों की मिलीभगत से भू-माफियाओं ने 2000 से 2011 के बीच 826 एकड़ सरकारी और निजी भू-खंड बेच दिये थे.

19 जून 2012 को सीबीआइ ने केस किया था टेक ओवर

जून 2012 में भूमि घोटाले की जांच पहले निगरानी ने संभाली. निगरानी ने जांच में पाया कि यह बड़ा स्कैम है. इसलिए इसकी सीबीआइ जांच होनी चाहिए. छह दिसंबर 2011 को पूर्व सीएम अर्जुन मुंडा ने सबसे बड़े जमीन घोटाले की सीबीआइ जांच की अनुशंसा की. 19 जून 2012 को देवघर जमीन घोटाले में सीबीआइ ने दो प्राथमिकी क्रमश: आरसी 15/12(डी) में 26 व केस नंबर 16ए/12(डी) में कुल 38 लोगों को आरोपी बनाया था. इसमें अभिलेखागार में छेड़छाड़ कर फरजी तरीके से जमीन बेचने और अभिलेखागार से कागजात चुराकर जलाने के मामले में सीबीआइ ने ये दोनों मामले दर्ज किये.