ग्रामीण क्षेत्रों से अनियंत्रित पलायन: विकास की असमानता ने बढ़ाई चिंता
Jharkhand: ग्रामीण इलाकों से शहरों की ओर बढ़ता अनियंत्रित पलायन अब एक गंभीर सामाजिक-आर्थिक समस्या का रूप ले चुका है। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण गांवों के युवा और श्रमिक वर्ग मजबूरी में महानगरों का रुख कर रहे हैं। इसका सीधा असर न सिर्फ ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है, बल्कि शहरों की व्यवस्थाएं भी चरमराने लगी हैं।
पलायन के प्रमुख कारण: ग्रामीण क्षेत्रों में खेती से होने वाली आय लगातार घट रही है। सिंचाई, उन्नत बीज, खाद और बाजार तक पहुंच की कमी किसानों को हतोत्साहित कर रही है। वहीं, गैर-कृषि रोजगार के अवसर सीमित होने से युवाओं के पास शहरों में काम ढूंढने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमजोर स्थिति भी पलायन को बढ़ावा दे रही है।
ग्रामीण समाज पर असर: युवाओं के पलायन से गांवों में बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे ही शेष रह जाते हैं। खेती-किसानी प्रभावित होती है और सामाजिक ताना-बाना कमजोर पड़ता है। कई गांवों के स्कूल में ड्रॉप आउट बच्चों की संख्या बढ़ती जा रही है और स्थानीय बाजार ठप पड़ते जा रहे हैं।
शहरों पर बढ़ता दबाव: ग्रामीण पलायन का बोझ शहरों पर भी साफ दिख रहा है। झुग्गी-झोपड़ियों का विस्तार, असंगठित क्षेत्र में मजदूरों की भीड़, बेरोजगारी और मूलभूत सुविधाओं की कमी जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं।
समाधान की जरूरत: विशेषज्ञों का मानना है कि पलायन रोकने के लिए गांवों में ही रोजगार सृजन जरूरी है। कृषि-आधारित उद्योग, लघु एवं कुटीर उद्योग, मनरेगा का प्रभावी क्रियान्वयन, कौशल प्रशिक्षण, बेहतर शिक्षा-स्वास्थ्य सेवाएं और मजबूत बुनियादी ढांचा ही इस समस्या का स्थायी समाधान हो सकता है।
जब तक ग्रामीण क्षेत्रों में सम्मानजनक जीवन और रोजगार के अवसर नहीं मिलेंगे, तब तक अनियंत्रित पलायन पर रोक लगाना मुश्किल होगा। यह समय है कि नीति-निर्माता गांव-केंद्रित विकास को प्राथमिकता दें।

