झारखंड की खनिज संपदा का दोहन, विकास और संघर्ष के बीच सिसकता राज्य

Nov 22, 2025 - 22:58
Nov 22, 2025 - 11:48
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झारखंड की खनिज संपदा का दोहन, विकास और संघर्ष के बीच सिसकता राज्य
AI के द्वारा बनाई गई तस्वीर

झारखंड की खनिज संपदा का दोहन और उससे जुड़े विवाद: विकास और संघर्ष के बीच झूलता राज्य

झारखंड देश का सबसे महत्वपूर्ण खनिज संपदा वाला राज्य माना जाता है। कोयला, लौह अयस्क, ताँबा, बॉक्साइट, क्रोमाइट, माइका, डोलोमाइट, चूना पत्थर और यहां तक कि यूरेनियम—राज्य की धरती बहुमूल्य संसाधनों से भरी है। भारत की कुल खनिज संपदा का बड़ा हिस्सा यहीं से निकाला जाता है। लेकिन इन खनिजों का दोहन लंबे समय से आर्थिक संभावनाओं के साथ-साथ सामाजिक, पर्यावरणीय और राजनीतिक विवादों का कारण भी बना हुआ है।


कोयला: ऊर्जा का बड़ा स्रोत, लेकिन प्रदूषण और विस्थापन भी

झारखंड में देश के सबसे बड़े कोयला भंडार मौजूद हैं। धनबाद, बोकारो, गिरिडीह और हजारीबाग को ‘कोल बेल्ट’ कहा जाता है।
लेकिन कोयला खनन के साथ कई समस्याएँ लगातार सामने आती रही हैं:

  • अवैध खनन और कोयला तस्करी का व्यापक नेटवर्क

  • खदान धंसने जैसी दुर्घटनाओं में हर साल मौतें

  • खुले खनन क्षेत्रों में बढ़ता वायु-प्रदूषण और धूल

  • खनन परियोजनाओं के लिए ग्रामीणों और आदिवासी समुदायों का विस्थापन

  • कृषि भूमि का नुकसान और भूजल स्तर में गिरावट

कोयला उद्योग राज्य की अर्थव्यवस्था में योगदान देता है, लेकिन इसकी कीमत अक्सर स्थानीय आबादी को चुकानी पड़ती है।


लौह अयस्क: उद्योगों की रीढ़, लेकिन अव्यवस्था की मार

सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां जिले में बड़े पैमाने पर लौह अयस्क की खदानें हैं।
यहाँ मुख्य मुद्दे हैं:

  • खदानों का लाइसेंस और नवीनीकरण को लेकर विवाद

  • ट्रकों की आवाजाही से सड़कों की खराब स्थिति

  • खान कंपनियों पर CSR (सामाजिक उत्तरदायित्व) गतिविधियों में कमी के आरोप

  • जंगल कटाई और पर्यावरणीय क्षरण

स्थानीय समुदायों का कहना है कि खनन कंपनियों का मुनाफा बढ़ता है, लेकिन गाँवों का विकास इसका प्रतिबिंब नहीं दिखाता।


यूरेनियम: सामरिक महत्व, पर स्थानीय विरोध और स्वास्थ्य चिंताएँ

पूर्वी सिंहभूम का जादूगोड़ा इलाका यूरेनियम खनन के लिए प्रसिद्ध है।
लेकिन यहाँ जुड़े मुद्दे और भी संवेदनशील हैं:

  • खनन क्षेत्रों में रेडिएशन फैलने के आरोप

  • स्थानीय लोगों में कैंसर, जन्मजात विकार और अन्य बीमारियों की शिकायतें

  • सुरक्षा मानकों और वैज्ञानिक मॉनिटरिंग पर उठते सवाल

  • ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों का विरोध

  • खनन कचरे (टेलिंग पॉन्ड) की सुरक्षा पर चिंता

यूरेनियम की रणनीतिक महत्ता के कारण सरकार इसे जारी रखना चाहती है, लेकिन स्थानीय समुदायों का विश्वास अभी भी कमजोर है।


पर्यावरण पर बढ़ता दबाव

खनन से जुड़े सबसे बड़े दुष्प्रभाव पर्यावरण पर दिखाई देते हैं:

  • बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई

  • नदियों और जल स्रोतों का प्रदूषण

  • वन्यजीवों का आवास नष्ट होना

  • भूमि धंसाव और खदानों में आग

  • जलवायु पर प्रभाव और बढ़ता तापमान

धनबाद के जारिया क्षेत्र में भूमिगत आग कई दशकों से जल रही है और अभी भी समस्या गंभीर बनी हुई है।


आदिवासी समुदायों पर प्रभाव

झारखंड की जनसंख्या में बड़ी संख्या आदिवासी समुदायों की है।
खनन ने इन समुदायों को सबसे अधिक प्रभावित किया है:

  • जबरन या कम मुआवजे पर विस्थापन

  • सांस्कृतिक और पारंपरिक भूमि का नुकसान

  • रोजगार का वादा पूरा न होना

  • स्थानीय कृषि और जंगल आधारित जीवनयापन खत्म होना

  • आंदोलन और प्रशासन के बीच लगातार टकराव

इन लोगों का कहना है—“संसाधन हमारे, लेकिन फायदा किसी और को।”


राजस्व और विकास: संभावनाएँ बहुत, क्रियान्वयन कमजोर

खनन उद्योग राज्य सरकार को हजारों करोड़ का राजस्व देता है।
लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि—

  • राजस्व का बड़ा हिस्सा प्रशासनिक खर्च में चला जाता है

  • खनन प्रभावित क्षेत्रों का विकास उम्मीद से बहुत कम

  • सड़क, स्कूल, अस्पताल जैसे बुनियादी ढाँचे में कमी

  • भ्रष्टाचार और पारदर्शिता की कमी

अगर खनन क्षेत्रों का सही विकास हो, तो झारखंड देश का सबसे समृद्ध राज्य बन सकता है।


निष्कर्ष: समाधान संतुलन में है

खनिज संपदा झारखंड की ताकत है, लेकिन यही ताकत उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती भी है।
राज्य के सामने अब दो रास्ते हैं:

  • बिना पर्यावरण और लोगों को नुकसान पहुँचाए जिम्मेदार खनन

  • लाभ के लालच में आने वाली पीढ़ियों का भविष्य खतरे में डालने वाला मॉडल

विशेषज्ञों का कहना है कि पारदर्शी व्यवस्था, तकनीकी निगरानी, स्थानीय लोगों की भागीदारी और पर्यावरण संतुलन के साथ ही खनन राज्य के लिए वरदान साबित हो सकता है।