गुरुजी के सपनों का झारखंड और आज की हकीकत
शिबू सोरेन जयंती पर विशेष: झारखंड आंदोलन के प्रणेता और “देशों गुरु” के नाम से विख्यात दिशोम गुरु शिबू सोरेन का संपूर्ण जीवन आदिवासी अस्मिता, जल-जंगल-जमीन की रक्षा और शोषित-वंचित समाज के अधिकारों के संघर्ष को समर्पित रहा। गुरुजी का स्पष्ट विचार था कि झारखंड की सत्ता और संसाधनों पर पहला अधिकार यहां के मूलवासी और आदिवासी समाज का होगा। लेकिन गुरुजी की जयंती के शुभ अवसर पर जब हम वर्तमान झारखंड की ओर देखते हैं, तो तस्वीर उनके विचारों के बिल्कुल विपरीत नजर आती है।
गुरुजी ने जिस झारखंड की कल्पना की थी, वहां जल-जंगल-जमीन पर बाहरी कब्जा नहीं, स्थानीय लोगों को रोजगार में प्राथमिकता, प्राकृतिक संसाधनों का न्यायपूर्ण उपयोग और भय-मुक्त प्रशासन उनकी विचारधारा का मूल था। परंतु आज हालात यह हैं कि खनिज संपदा से समृद्ध होने के बावजूद झारखंड का आदिवासी समाज बेरोजगारी, विस्थापन और गरीबी से जूझ रहा है।
वनाधिकार कानून और भूमि सुरक्षा से जुड़े प्रावधान कागजों तक सिमटते दिख रहे हैं। कई क्षेत्रों में विकास के नाम पर आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल किया जा रहा है, जबकि स्थानीय युवाओं को रोजगार देने के दावे केवल घोषणाओं तक सीमित हैं। गुरुजी जिन ताकतों के खिलाफ जीवन भर संघर्ष करते रहे, उन्हीं ताकतों का प्रभाव आज नीतियों और फैसलों में झलकता दिखाई देता है।
गुरुजी का सपना था कि झारखंड में शासन जनभागीदारी और पारदर्शिता पर आधारित होगा, लेकिन आज भी भ्रष्टाचार, बिचौलिया व्यवस्था और सत्ता-प्रशासन की दूरी आम जनता से बनी हुई है। सवाल यह भी है कि क्या गुरुजी की विचारधारा केवल जयंती और पुण्यतिथि तक सीमित होकर रह गई है?
शिबू सोरेन की जयंती पर केवल माल्यार्पण और भाषण ही नहीं, बल्कि आत्ममंथन की जरूरत है। झारखंड को फिर से उसी रास्ते पर लाने की आवश्यकता है, जिस रास्ते की नींव गुरुजी ने रखी थी—जहां आदिवासी, दलित और पिछड़ों का स्वाभिमान, सामाजिक न्याय और संसाधनों पर हक सिर्फ नारे नहीं, बल्कि धरातल की सच्चाई हों।
यही गुरुजी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

